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काल सर्प दोष — डर या धोखा?

 भय और भ्रम का पर्दाफ़ाश

भूमिका

जब किसी जन्म कुंडली में सभी सात ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित होते हैं,
तो कहा जाता है कि वहाँ काल सर्प योग बना हुआ है।

कुछ नव-रचित ग्रंथों में इसे अत्यन्त पापक योग बताया गया है – ऐसा योग जो 47 वर्ष तक,
या कभी-कभी पूरे जीवन भर प्रभाव डालता है। इन वर्णनों में कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति को
जीवन में स्थिरता नहीं मिलती, अपमान और तनाव रहता है, यहाँ तक कि सपनों में साँप नज़र आते हैं!

दूसरी ओर कुछ पुस्तकों में उलटा मत दिया गया है,  कि यह योग व्यक्ति को बहुत साहसी, व्यावहारिक और
आकर्षक व्यक्तित्व वाला बनाता है।

स्पष्ट है कि एक ही योग के बारे में ख़ुद ज्योतिष समुदाय के भीतर विरोधाभासी मत मौजूद हैं।


‘काल सर्प योग’ की असली वैज्ञानिक पृष्ठभूमि

राहु और केतु को हम चन्द्र के आरोही और अवरोही (Ascending and Descending)  Nodes को  कहते हैं,  यानी वे बिंदु जहाँ चन्द्र की परिक्रमा-कक्षा सूर्य की दृश्य पथ (सूर्य क्रांति वृत्त) को काटती है। इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है; ये केवल संदर्भ-बिंदु (reference points)  (Inter-Section points) हैं।

जन्म कुंडली एक द्वि-आयामी चित्र होती है, इसलिए ऐसा लगता है कि अन्य ग्रह राहु और केतु के बीच आ गए हैं;
पर वास्तविक आकाश में हर ग्रह अपनी अलग-अलग ऊँचाई (altitude) और दिशा (azimuth) में गति करता है।
इसलिए यह कथित ‘काल सर्प योग’ खगोल की दृष्टि से वैज्ञानिक रूप से असंगत है।


अन्य ग्रहों के भी Nodes (Inter Section Points) होते हैं

केवल चन्द्र ही नहीं, बल्कि बुध और शुक्र भी अपनी कक्षा से सूर्य क्रांति वृत्त को काटते हैं,
जिससे उनके भी आरोही-अवरोही Nodes या Inter-Section points बनते हैं। लेकिन कोई इनसे ‘काल सर्प योग’ नहीं घोषित करता!  इसका कारण है जानकारी की कमी.


नाम का भय और भ्रम

“काल” का एक अर्थ ‘समय’ है और दूसरा ‘मृत्यु’। “सर्प” अर्थात् साँप।
दोनों को मिलाकर नाम बना – काल-सर्प, जो स्वतः ही भय उत्पन्न करता है।
इसी भय का फ़ायदा उठाकर कुछ लोगों ने इस योग को वाणिज्यिक रूप से बेचना शुरू किया  – “पैसा कमाने का साधन।”


मूर्तिकार की कहानी — एक प्रतीक

एक राजा ने मूर्तिकार से कहा, “तुमने पत्थर से जीवित प्रतिमा बना दी।”
मूर्तिकार बोला, “मैंने कुछ नहीं बनाया राजन, सौंदर्य तो पहले से पत्थर के भीतर था; मैंने बस फालतू का पत्थर ही हटाया है।”

ऐसा ही कुछ ज्योतिष के साथ भी हुआ है।
समय के साथ कई अनावश्यक धारणाएँ (जैसे काल-सर्प योग, साढ़े-साती का अत्यधिक भय) इस विज्ञान में अनावश्यक रूप से जोड़ दी  गई हैं।  अब समय है कि इन “पत्थर की अतिरिक्त परतों” को हटाकर ज्योतिष का वैज्ञानिक रूप समाज के सामने लाया जाए।


वास्तविकता क्या है?

किसी कुंडली में यह संयोग कई महान व्यक्तित्वों में भी मिला है — जवाहरलाल नेहरू, सचिन तेंदुलकर, धीरुभाई अंबानी, मार्गरेट थैचर आदि।  स्पष्ट है कि यह कथित योग सफलता को न रोक सकता है न विनाश ला सकता है।

प्रत्येक ग्रह का फल उसके स्वयं के स्थान, दृष्टि, संयोग, नक्षत्र, दशा आदि से निर्धारित होता है , न कि किसी कृत्रिम “योग” से।


निष्कर्ष

“काल सर्प दोष” का कहीं भी क्लासिकल/पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख नहीं मिलता।
यह सिर्फ़ एक आधुनिक भय-आधारित कथा है, जिसका वास्तविक वैज्ञानिक या आध्यात्मिक आधार नहीं है।

राहु और केतु का स्वयं का महत्व अवश्य है , लेकिन वो उनके व्यक्तिगत स्थिति और दृष्टि से निर्धारित होता है, न कि “काल सर्प योग” नामक किसी मिथक से।


आप स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और समृद्ध रहें

अशोक शर्मा
The Mystic | RahuKetu Astro Academy

www.RahuKetu.com


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